ज्यों त्यों जीवन के संघर्ष

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ऊष्मा उन दीपकों की रात भर जलती रही,

ज्यों ज्यों गगन काला पड़ा त्यों त्यों निशा  चढ़ती रही।

और,  उस तिमीरावृत्त निशि में नेत्र लज्जा में झुके

ज्यों चंद्रमा ढलता रहा वह अंक में गिरती रही।

उस हवा को गर्व था कि यूं अनल बुझ जाएगी,

ज्यों ज्यों अनिल चलती रही त्यों त्यों अनल बढ़ती गई।

लेखकों के ही  वचन सभी सच्चे लगते हैं क्यों?

वो कथा गढ़ता गया, और पात्र वो बनती गई।

कुछ ही प्रश्नो के जवाबों को अनावश्यक  दिया

जैसे समय बढ़ता रहा, डोरी प्रेम की  सड़ती रही। 

 

                                                   – अर्चिष्मान सक्सेना

 

 

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