दूसरी आज़ादी

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“दाऊ ले लो ना, 5 रुपए का ही तो है!!”

“नहीं लेना ना! और एक बात बता, स्कूल क्यों नहीं जाता? प्लास्टिक का झंडा बेचता रहता है.”

“1000 नहीं बेचा तो मालिक मारता है. पैसा नहीं आया तो भाई को सचिन कैसे बनाएगा? और बेवड़ा बाप माई और हमको पीटता रहता है.”

“वैसे दाऊ, स्कूल कोई टॉफ़ी है क्या?”

मैं सन्न रह गया. एक नज़र उसकी सूरत को देखा, फ़िर कपड़ों को, फ़िर हाथ में प्लास्टिक के झंडों को.

“वाह दाऊ, दिन बना दिया अपना. अपुन याद रखेगा!!”

वो 500 का नोट ले भाग गया. मैंने झंडों को झोले में डाला और गाड़ी बढ़ा ली. मन कड़ा कर लिया.

दूसरी आज़ादी की लड़ाई लड़ने का वक़्त आ गया था.

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