सुनो दर्ज़ी मास्टर

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सुनो दर्ज़ी मास्टर,

फट रहा है मेरी रूह का पैराहन।
अदब गिर रही है
जैसे फटी जेबों से गिरते हैं सिक्के।
अकेलेपन के साये में
रंगत फ़ीकी पड़ रही है
नीयत के कपड़े की
और इश्क़ के धागों से सिले,
रिश्तों के बटन भी टूट गए हैं,
जो कभी हिफ़ाज़त करते थे
आबरू-ओ-एहसास की।
थोड़ी मरम्मत चाहिए।

आस्तीन, जो कभी ढँककर रखती थी
मेरी कारस्तानियों को,
आज सब कुछ नुमाया कर देती है।
घुटन सी महसूस होती है
सीने के पास।
तंग काँखें बाज़ुओं की
ज़ुम्बिश में ख़लल बन गईं हैं।
कह नहीं सकता,
कब तक चला पाऊँगा यूँ।
जाने कब सरेबाज़ार इज़्ज़त नीलाम हो जाये,
यही सोचकर हूँ ख़ौफ़ज़दा।
ज़रा जल्दी रफ़ू कर दो।

मैं जानता हूँ, पूरी तरह नहीं मिटेंगीं वो खरोंचें,
न जुड़ पाएंगी वो टूटी डोरियाँ।
पर तुम्हारे सूई-धागों में
हुनर है इनको छुपाने का,
ज़माने की नोच खाने वाली नज़रों से।
नहीं हैं तो बस वो चीथड़े
जिन्हें ढूँढ, पोशाक में लगाने की ज़द में हूँ।
पर नाकामी के सिवा
कुछ हाथ आता है तो सिर्फ़
एक बढ़ता हुआ बदन,
जो बहुत बढ़ गया है
अपनी नाप से,
इतना कि वो पोशाक फिर से पहनना
एक ख़्वाब सरीखा लगता है।

पीयूष शिवम्

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