हमकदम

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वो चुपचाप चलते कदम,
वो राह में रुकते कदम ।
खामोशी से राह में,
हमकदम बनते कदम ।
था अनकहा इंतज़ार,
था अनकहा एतबार,
खामोश हवाओं में घुली थी,
साथ चलने की सदा ।
गुजरा वक़्त,
बदला मंजर
दिखते हैं फिर भी कहीं,
वो चुपचाप चलते
खामोश कदम ।

 

संजय नायक ‘शिल्प’ द्वारा समीक्षित:

ये महज एक कविता नहीं है, बल्कि दो खामोश प्रेमियों की व्यथा कथा है जो बरसों एक राह पर साथ चले हैं, ये अलग बात है कि ये तब भी खामोश थे मगर निगाहें बोलती थी।

वो एक दूसरे के उसी राह पर आने जाने का इंतजार करते, और किसी एक के देर से आने पर किसी बहाने से राह में इंतजार करते, और फिर साथ चल पड़ते। वो प्रेम था, अनकहा खामोश प्रेम। जो शायद हर किसी की जिंदगी में आता है।

वक़्त ने दोनों को दूर किया और मंजिले बदली, रास्ते बदल गए। खमोश प्रेम आज भी जिंदा है। और कई बार यूँ ही अनचाहे उन्ही रास्तों पर फिर से कभी कभार एक दूसरे को दिख जाते हैं।

मगर अब वो साथ नहीं चलते, दो प्रेमियों के खामोश कदम ,चुपचाप एक दूजे को विदा कह देते हैं।

छन्द मुक्त कविता है, मगर कुछ लाइन एक दूसरे को तुकांत करके, लेखन शिल्प को निखारती हैं, लेखिका बहुत ही साधारण शब्दों में बड़ी बात कहने का माद्दा रखती हैं, वो कविता को जिस तरह से कहती हैं उसमें पूरी एक कहानी होती है, जिसमें आदि से अंत तक प्रवाह युक्त , मधुरता का भान होता है।

साधारण आम शब्दों में कविता कहना अपने आप मे एक बड़ी बात है। आम आदमी की कविता है ये। और कहीं न कहीं हर व्यक्ति की खुद की कहानी कहती है। कविता पास से शुरू होकर काश पर खत्म होती है, लेखिका बधाई की पात्र हैं।

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