वह तो तेरे पास आ रही थी

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वह दौड़ रही थी,
पूरी शक्ति लगाकर भाग रही थी,
जैसे कोई दरिंदा पड़ा हो उसके पीछे;
पर बऱखुरदार, वह तो तेरे पास आ रही थी।

न जाने कहाँ से आ रही थी!
क्योंकि वह तो भागते ही जा रही थी।
न पीछे मुड़कर देखा, न सांँस बटोरी,
क्योंकि बऱखुरदार, वह तो तेरे पास आ रही थी।

दौड़ रही थी, जैसे इंतजार में कितने बरस बीते!
उस अंधेरी नगरी के उन दीवारों के पीछे।
अब वह रौशनी की ओर दौड़ी चली जा रही थी;
पर बऱखुरदार, वह तो तेरे पास आ रही थी।

वह लड़खड़ाई, दो बूंद आंँसू भी दलके,
पर उन चंद लम्हों की उसे करनी थी भरपाई,
पर, न जाने क्यों वह अब धीरे-धीरे चल रही थी!
फिर भी बऱखुरदार, वह तो तेरे पास ही आ रही थी।

बस, अब कुछ लम्हों की देरी थी,
वह थक कर चूर हो चुकी थी,
और, जैसे हीं वह गिरी,
दो बाहों में समा गई वह,
और वह हँंसी,
क्योंकि बऱखुरदार,
वह तो तेरे पास पहुंँच चुकी थी।

Sakshi Ragini

Review by Rishi Kumar
कविता में नयी कविता की खूबियाँ बख़ूबी प्रदर्शित हो रही हैं| एक कौतुहल नज़र आता है जो पाठक को बाँधे रखता है| रहस्यवाद और कोमलता को एक साथ लाकर कवि ने बड़ी चतुराई से पाठकों को अपने साथ जोड़ लिया है| प्रेमिका का प्रेमी के पास पहुँचने का घटनाक्रम बड़ा उलझन भरा है| किससे डर कर भाग रही थी और क्यों, यह एक रहस्य छोड़ दिया गया है| अनुभूति युक्त सरल और उपयुक्त भाषा प्रयुक्त हुई है| बीच में एक बार उसका दौड़ना थम जाता है| वह धीमे चलने लगी, यह बात पाठकों को अटपटी लग सकती है क्योंकि कवि ने कोई कारण उल्लेखित नहीं किया है| छायावादी कवियों, खासकर, महादेवी वर्मा की कविताओं को पढ़ कर प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं| शुभकामनाएं!

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