रामराज्य

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आँसू गिरे नयन उत्पल से
पिघले शैल, अचल,पाहन सब
भरे लबालब पुष्कर तट तक
सरिता बहे कहे सिंधु से जल्दी इन्हें संभालो
संसृति के ऊपर दुःखों की भारी आफत आयी
कोयल चीखी केकी ने आँसू की झड़ी लगाई
व्याल,गाछ,कुंजर,केहरि भी देने लगे दुहाई
मैना,हंस,गाय, गंगा ने अपनी पीर बताई
रत्नाकर ने तब संसृति के नयन नीर को प्रभु चरणों में चढ़ाया
और कहा प्रभु मानव का सब है ये किया कराया
लोभ के वशीभूत हो उसने यह उत्पात मचाया
कृपानिधान दया के सागर,वसुधा को शीघ्र बचाओ
तब रौद्र रूप धारण कर प्रभु ने मानव को फटकारा
लगा कांपने मानव भय से देने लगा दुहाई
दूर करे दुर्गुण सब उसके फिर से दिया रचायी
देख नए मानव को सबने उत्सव बड़ा मनाया
लौटा रामराज्य वसुधा पर
हो गया दुःख पराया
— Rishi Kumar

Reviewed by Shubham Gupta :

कवि ने कविता के माध्यम से जनमानस को प्रदूषण के भयंकर परिणामों से सचेत करते हुए धरती का कम से कम दोहन करने का संदेश दिया है। अतिशयोक्ति अलंकार व हिंदी पर्यायवाची शब्दों का उचित प्रयोग कविता को अलंकृत करता है तथा कवि की कल्पनाशक्ति इससे अलग स्तर पर ले जाती है।
कहीं कहीं पर तुकबंदी शब्दों का उचित प्रयोग न होना तथा पंक्तियों में शब्दों का समानुपात न होना काव्य-सौंदर्य में बाधक बन सकता है।
जागरूक प्रयास है, ऐसे ही लिखते रहें।
शुभकामनाएं।

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