घुटन

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घुटन बाहरी हो या भीतर की
बेचैन करती है
दमन होता है स्वाभाविकता का
खंडित करती है मैं होने को
खीझ से भर देती है मन को
क्या तमाम उम्र जिया जा सकता है
अगर कुछ दिनों की बात हो तो शायद
सोचता हूँ अक्सर इसके जनक के विषय में
कोइ निर्णय नहीं
चलो किसी से पूछा जाए
कौन बतावै
बुद्धिमान या मुर्ख
ज्ञानी ने बड़ी बातें बतायीं तर्क से तर्क टकराये
विद्रोह के चिह्न भी दिखलाये
करो भरोसा खुद पर कुछ भी असंभव नहीं
तेरी मुट्ठी में आसमां एक तबियत से पत्थर तो उछाल
मोटिवेशन गुरु,पॉज़िटिव थिंकिंग
न जाने क्या-क्या
कुछ न समझा
साधारण मूर्ख सा दिखने वाला
सिखा गया कुछ जरुरी बातें
छोड़ दे सब विधाता पर
सोच उतना जितना जरुरी
उतना कमा जितना जरुरी
खुद को बुद्धिमान समझना छोड़
बैठ मुझ जैसों के बीच
हँसकर बजा ले गाल
और सबसे जरुरी
मस्तिष्क का वॉल्यूम कम
शरीर का बढ़ा दे
अब कुछ-कुछ समझ पाया
– Rishi Kumar

Reviewed by – Sanjay Pathak

बेचैनी और विद्रोह ही कवि हृदय की सुंदरता और उसकी प्रेरणा है । यही वो बीज है जिससे कविता अंकुरित होती है । प्रस्तुत कविता इसी की परिणिति है और इसी समस्या का सुंदर हल। कविता स्पष्ट संदेश देती है कि अतिमहत्वाकाँक्षाओं से उत्पन्न खीझ भरे जीवन को छोड़ आत्मविश्वास, आत्मबल और दृढ़संकल्प से निर्धारित जीवन-राह ही आदर्श जीवन मार्ग है और सम्पूर्ण उपलबद्धि इसी के माध्यम से सम्भव हैं।
यहाँ कवि ने सच्चे ज्ञान का वारिस साधारण जन माना है न कि किसी विशिष्ट जन को। उसकी यह स्पष्ट घोषणा है कि आवश्यक नहीं कि समस्या का हल किसी विद्वान अथवा ज्ञानी के पास ही मिलेगा जबकि हमारे इर्द-गिर्द के अतिसामान्य जन ,कहीं ज़्यादा व्यावहारिक ज्ञान देने में सक्षम हैं।
कविता की सरल और सहज भाषा सभी स्तर के मस्तिष्क को पोषित करने में समर्थ है।

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