गज़ब के थे ना वो दिन

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गज़ब के थे ना वो दिन
जब तुम्हारे लबों पर बस नाम हमारा था,
याद आते हैं ना वो दिन,
जब तुम्हारी बस की सीट पर आधा कब्ज़ा हमारा था।
गज़ब के थे ना वो दिन,
जब क्लास में उठ कर बस तुम्हें देखा करते थे,
याद आते हैं ना वो दिन,
जब पनिशमेंट में भी वहीं खड़ा हुआ करते थे
जहाँ से तुम साफ़ दिखा करते थे।
कितने मसरूफ थे ना वो दिन,
जब कॉपी के पीछे बिंगो खेलते हुए पकड़े जाया करते थे,
याद आते हैं ना वो दिन,
जब खेलों में हम कभी खुद भी हार जाया करते थे।
कितने गज़ब के थे ना वो दिन,
जब हाथों में हाथ डाल कर सब से अलग बैठ जाया करते थे,
याद आते हैं ना वो दिन,
जब प्यार में धूम कर तुम्हें उसे अपनी गलती बताया करते थे।
कितने अच्छे थे ना वो दिन,
जब शफ़क़ से पहले कॉल किया करते थे तुम,
याद आते हैं ना वो दिन,
जब बहुत रात तक छुप-छुप कर बात किया करते थे हम।
कितने मशरूफ थे ना वो दिन।
जब बिन बात के मजाक में डांट दिया करते थे तुम,
याद आते हैं ना वो दिन,
जब थक के तुम्हारे पास बैठ जाया करते थे
और तुम हँस कर परेशानी टाल दिया करते थी ।
कितने गज़ब के थे ना वो दिन,
जब तुम्हारी आँखों में आँख डाल वक्त निकाल दिया करते थे हम,
याद आते हैं ना वो दिन,
जब साथ जीने की कसमें खाया करते थे तुम।
पर मालूम है हमको अब लौट के ना आओगे तुम,
अब कहीं दूर आसमान में हस्ती है तुम्हारी,
अब इतना नीचे देख ना पाओगे तुम,
हमें मालूम है यूँही सब भूल जाओगे तुम,
हमें मालूम है उन दिनों को याद ना कर पाओगे तुम,
क्योंकि ये कसमें हैं इनका क्या है
बातों को तो आराम से भुला दोगे तुम।
पर वो तो दिन थे जो याद आते हैं
अब तो बस वक़्त काटते हैं हम।
– Naveen Bhardwaj

Reviewed by- Rishi Kumar
लड़कपन की उन यादों को बड़े ही सजीव तरीके से अभिव्यक्त किया है।खेलना,छुप छुप कर बात करना दोबारा उन दिनों को सोचने पर पाठक को मजबूर कर देता है।सहज प्रचलित शब्दों को प्रयुक्त किया है। ‘अब कहीं आसमान में हस्ती है तुम्हारी’ आँखों को नम कर जाता है। ‘शफ़क़’ के साथ ‘कॉल’ शब्द थोड़ा बेमेल लग रहा रहा है
कुछ पंक्तियों का अर्थ स्पष्ट नहीं हो पता जैसे ‘जब प्यार में धूम कर …’
कविता में अंत तक बांधे रखने की काबिलियत है,जो कवि की चतुराई है।सराहनीय प्रयास है।

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