खाली कमरा

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कल‌ मेरे हाथों में सुर्ख छाले मिले,
मेरे गुनाह कल उसके हवाले मिले।
मेरी दकियानूसी मोहब्बत ज्यादा दिन न चली,
उसके इश्क में तो बड़े-बड़े दाख़िल मिले।

अक्सर समन्दरों के किनारों से बात की‌ मैंने,
जो उससे कह ना सका वो हर बात लिख दी मैंने।
अफ़सोस उसकी दिलासा कभी दिल को मिल न पायी,
बस उसका ही तो नाम‌ छुपा रखा है इस दिल में।

कोई कोई तो सिर्फ मुझे शायर समझता रहा,
मैं तो‌ उसके घर के पास खा़मखां भटकता रहा।
दिन दहाड़े सरे बाजार लुट गयी मेरी मोहब्बत,
शायद आजतक वो मुझे पागल समझता रहा।

एक बार दरवाजे पर दस्तक भी दी थी मैंने,
आहट तो‌ हुई थी बस मुलाकात का‌ फ़र्क था।
वो सोता रहा गहरी नींद में और हम उसे जगा न सके,
वो तो सपनों में जिक्र किसी और का ही करता रहा।

अब मोहब्बत कहां अंगारे दिखते हैं रास्तों में,
अब कोई झूठी दिलासा भी तो नही देता वास्तों में।
मैं तो सोचता हूँ अब सवेरा भी न हो किसी खुशी का,
रात ही रात रहे हर गुलाब के खुशबूदार बगीचों में।

देख लेना, मैं तो खुदगर्ज़ एक दिन खुद में हो जाऊंगा,
बिन बताए ही एक दिन उससे दूर हो जाऊंगा।
अगर कभी पड़ी भी ख्वाबों में उस पर नजर,
मैं देखकर भी एक दिन अनदेखा कर जाऊंगा।

मुझको‌ उसकी‌ मोहब्बत का हर कतरा महंगा पड़ा,
शाम‌ ढलते ढलते‌ ही ढल‌ गया अन्दर का आशिक बड़ा।
बड़ी ऊंची सपनों की हवेली बनायी थी मैंने,
आज तो एक छोटा सा कमरा है वो भी‌ खाली‌ पड़ा।

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