एक बार ऐसे ही

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जब दिन भर की दौड़ से हो निढाल
सूर्यदेव समेटते किरणों का जाल
तब कुछ चंचल-उत्साहित किरणें
नहीं सिमटती अपने आँगन में
हर दरवाजे पर देती है दस्तक
आ जाती है मेरे घर तक
खिड़की से अंदर घुसती
मौका मिलता जैसे ही
तुम भी कभी आ जाओ
एक बार ऐसे ही ।

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