आज भी तेरी दी हुई कसमें जिया करता हूँ मैं

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जमात में तेरी भले ही शामिल न हो पाऊं
पर तेरी रूह में अब भी डूबा हुआ हूँ मैं
थोड़ा काला हूँ, थोड़ा बेकार सा भी हूँ,
पर तेरे सपनों में बाजीगर अब भी बना हुआ हूँ मैं
तुम सोचती हो इश्क़,इबादत होती नहीं मुझसे
पर जमाने भर की नजरों में, मैं अब भी बिगड़ा हुआ हूँ
जिन चेहरों को तुम भूल चुकी हो, आज भी उनसे मिला करता हूँ मैं
हाँ मेरी बेवफ़ाई की बात करती हो तुम
मालूम हो तुमको
आज भी तेरी दी हुई कसमें जिया करता हूँ मैं
– Naveen Bhardwaj

Reviewed by – Mridul Shrotriya
कवि ने एक अच्छी कोशिश की है, दूसरी पंक्ति में एक ‘में’ का इस्तेमाल अधिक लग रहा है। पहली 4 पंक्तियों में हर दूसरी पंक्ति का अंत “मैं” से किया गया है, पर आगे के शेर में यह बात लागू नहीं होती, इस तरह से कविता या ग़ज़ल का अनुशासन बिगड़ता है, और पढ़ने वाले भी पूरी तरह रस नहीं ले पाते।
“मैं अब भी बिगड़ा हुआ हूँ” में थोड़ा संशोधन करके “अब भी बिगड़ा हुआ हूँ मैं” करने से तुकबंदी अच्छी बनती मालूम होती है। कहीं ‘तुम’ और कहीं ‘तू’ का प्रयोग अटपटा लगता है।
कवि ने कई अच्छे शब्दों का चुनाव ज़रूर किया जैसे “इश्क”, “इबादत”, “बेवफा” मगर शेर पूरी तरह इन शब्दों के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं।
रचनाकार ने चंद अलफ़ाज़ में पाठक को बात की गहराई तक ले जाने का अच्छा प्रयास किया है। शब्दों पे पकड़ अच्छी है।
मेरे सुझाव से आप फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और राहत इंदौरी की कुछ ग़ज़ल पढ़े, जिस से शब्दों का सही इस्तेमाल सीखने मिलेगा।
उम्मीद है आप आगे और भी अच्छा लिखेंगे।
शुभकामनाएं।

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